ट्रंप का ईरान पर आर्थिक शिकंजा, डिजिटल करंसी से सोने और शिपिंग तक निशाने पर; भारत पर भी असर

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नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया है। अमेरिका ने ईरान से जुड़े कारोबार और वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई का दायरा बढ़ाते हुए डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों को भी निशाने पर लिया है। अमेरिकी ट्रेजरी के मुताबिक, नए कदमों का उद्देश्य ईरान की उन आर्थिक और वित्तीय गतिविधियों को रोकना है, जिनके जरिए वह प्रतिबंधों के बीच अंतरराष्ट्रीय कारोबार और धन का प्रवाह बनाए हुए है।

ईरान पर ट्रंप का नया आर्थिक वार

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने 24 अगस्त को ईरान के खिलाफ नई कार्रवाई की घोषणा की। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने करीब 60 ईरान से जुड़ी संस्थाओं, व्यक्तियों और अन्य नेटवर्क पर कार्रवाई की है। इसके साथ ही वॉशिंगटन ने उन देशों और कंपनियों को भी चेतावनी दी है, जो ईरान के साथ कारोबार जारी रखते हैं। ऐसे कारोबार पर आगे चलकर सेकेंडरी सैंक्शंस का खतरा बढ़ सकता है।

डिजिटल करंसी से सोने तक पर नजर

अमेरिका की नई रणनीति में ईरान के लिए इस्तेमाल होने वाले वैकल्पिक वित्तीय रास्तों पर खास नजर है। क्रिप्टो और डिजिटल एसेट्स, सोना, टेक्नोलॉजी, एविएशन और शिपिंग को प्रतिबंधों के दायरे में लाने से ईरान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैसा और सामान हासिल करना मुश्किल हो सकता है। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि डिजिटल एसेट्स समेत कुछ नेटवर्क का इस्तेमाल प्रतिबंधों से बचने और तेल से जुड़े लेन-देन को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है।

भारत पर क्यों पड़ सकता है असर?

ईरान पर बढ़ते अमेरिकी प्रतिबंधों का असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत और ईरान के बीच कारोबार पहले की तुलना में काफी कम हो चुका है, लेकिन चावल, चाय, फार्मास्युटिकल्स और अन्य वस्तुओं का व्यापार अभी भी महत्वपूर्ण है। हालिया अमेरिकी प्रतिबंधों और यूएई के जरिए व्यापार एवं वित्तीय लेन-देन में आई रुकावट से भारतीय निर्यातकों के लिए भुगतान और शिपिंग की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

रॉयटर्स के मुताबिक, 2026 की शुरुआत में भारत ने ईरान को करीब 383 मिलियन डॉलर का चावल और 14 मिलियन डॉलर की चाय निर्यात की थी। भारतीय निर्यातकों के लिए अब वैकल्पिक व्यापार मार्ग और भुगतान व्यवस्था तलाशना जरूरी हो सकता है।

चाबहार पोर्ट पर भी बढ़ सकती है मुश्किल

भारत के लिए ईरान का चाबहार पोर्ट रणनीतिक और व्यापारिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। ईरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ने से चाबहार के संचालन, भुगतान व्यवस्था और भारत-ईरान के बीच लॉजिस्टिक्स से जुड़े कामों में नई चुनौतियां पैदा होने की आशंका है। भारत के लिए चाबहार मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का एक अहम विकल्प माना जाता है।

महंगा हो सकता है शिपिंग और माल ढुलाई का खर्च

ईरान पर प्रतिबंधों का असर केवल भारत-ईरान कारोबार तक सीमित नहीं रह सकता। क्षेत्र में शिपिंग और बीमा की लागत बढ़ने से भारतीय कारोबारियों पर भी दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के लिए सबसे बड़ा असर ऊर्जा, शिपिंग, बीमा और भुगतान व्यवस्था के जरिए देखने को मिल सकता है।

भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतें भी अहम हैं। यदि ईरान से जुड़े तेल कारोबार और क्षेत्रीय शिपिंग पर दबाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव भारत के आयात बिल, रुपये और महंगाई पर पड़ने की संभावना है।

भारत-ईरान कारोबार पर क्या होगा असर?

भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय कारोबार पहले ही काफी घट चुका है। रॉयटर्स के अनुसार, 2018-19 में दोनों देशों का व्यापार करीब 17 अरब डॉलर था, जो अब 90 फीसदी से अधिक घट चुका है और मुख्य रूप से मानवीय जरूरतों से जुड़े सामान तक सीमित रह गया है।

ऐसे में अमेरिका की नई कार्रवाई का तत्काल असर सीमित हो सकता है, लेकिन भुगतान, बीमा, शिपिंग और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की लागत बढ़ने से भारतीय कारोबारियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

आगे क्या?

अमेरिका के नए कदमों से ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ उन देशों और कंपनियों के लिए भी जोखिम बढ़ गया है, जो तेहरान के साथ कारोबार करते हैं। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह ईरान के साथ अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को बनाए रखते हुए अमेरिकी प्रतिबंधों से पैदा होने वाले जोखिमों को कैसे मैनेज करता है।

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