श्रावण : शिव भक्ति और प्रकृति का उत्सव

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गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर श्रावण मास का हिंदू परंपरा में अत्यंत विशेष स्थान है। यह महीना भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए सर्वाधिक पावन माना जाता है। उत्तर भारत में विशेष रूप से श्रावण और दक्षिण भारत में कार्तिक मास शिव भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

हममें से बहुत से लोग भले ही इसके गूढ़ अर्थ को न जानते हों, लेकिन परंपरागत रूप से हम इस माह को पवित्र मानते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं।लेकिन क्या भगवान शिव केवल मंदिर में ही हैं? नहीं। शास्त्रों में कहा गया है—‘ब्रह्माण्ड व्याप्त देह’, अर्थात सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही शिव का स्वरूप है। धरती उनके चरण हैं और आकाश, नक्षत्र आदि उनके गले का हार। जब उनकी देह सम्पूर्ण सृष्टि है तो उन पर जल कैसे चढ़ाया जाए? वास्तव में वर्षा के रूप में स्वयं प्रकृति भगवान शिव का अभिषेक करती है।


श्रावण मास में जब आकाश से वर्षा होती है, धरती की प्यास बुझती है, हरियाली लहलहाने लगती है और सम्पूर्ण सृष्टि आनंदित हो जाती है। यह दृश्य मानो स्वयं शिव के जलाभिषेक का है। इसी दिव्यता से प्रेरित होकर हम शिव की पूजा करते हैं, उपवास रखते हैं और जलाभिषेक करते हैं।
लेकिन शिव की पूजा केवल बाहरी नहीं है। शिव हमारे भीतर भी निवास करते हैं। साधना और ध्यान के माध्यम से हम उस अंतर्यात्रा में प्रवेश कर सकते हैं, जहाँ शिवत्व का साक्षात्कार होता है।

देवी पार्वती भगवान शिव की अर्धांगिनी होने के साथ उनकी प्रथम शिष्या भी हैं। वे उनसे पूछती हैं—‘हे देव, परब्रह्म की गति कैसे प्राप्त की जाती है?’ भगवान शिव बहुत सुंदर उत्तर देते हैं—

अनाहते पात्रकर्णेऽभग्न शब्द सरिद्द्रुते।
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति॥
एक सूक्ष्म ध्वनि है जो हर क्षण हमारे भीतर गूँजती रहती है—अनाहत नाद। इसे सुनने के लिए बस शांत बैठकर मन को स्थिर करना होता है। जब बाहरी शोर से मन हटता है, तब भीतर की मौन ध्वनि का अनुभव होता है।
यह ध्वनि किसी नदी की सतत बहती धारा या जंगल में झींगुर की आवाज़ की तरह अनवरत चलती रहती है। शिव स्वयं माता पार्वती से कहते हैं कि जो इस अनाहत नाद में लीन हो जाता है, वह परम ब्रह्म की ओर अग्रसर होता है।


श्रावण केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एकात्मता और साधना का अवसर है। जैसे वर्षा से धूल धुलती है और धरती का नवजीवन खिल उठता है, वैसे ही साधना से मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और भीतर का प्रकाश प्रकट होता है।
इसी आध्यात्मिक भावना को साकार करते हुए मीडिया कोऑर्डिनेटर शिवानी व्यास ने बताया कि जोधपुर में श्रावण मास के पावन अवसर पर 51 रुद्र पूजाएँ विभिन्न स्थानों—घर, कार्यालय और स्कूलों में—विधि-विधान एवं श्रद्धापूर्वक संपन्न हुईं। इन पूजाओं के माध्यम से अनेक लोगों ने भगवान शिव की आराधना करते हुए इस पावन मास की दिव्यता का अनुभव किया।
बेंगलुरु से पधारे स्वामी राहुल जी ने वेदों एवं मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के साथ रुद्र पूजा का विधिवत संचालन किया। उनके द्वारा किए गए मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से पूरा वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो गया I
इस आयोजन को सफल बनाने में सुनील भारद्वाज, दुष्यंत शर्मा एवं दिव्या भारद्वाज जो जोधपुर के VDS के कोऑर्डिनेटर हैं , के सहयोग से विभिन्न स्थानों पर आयोजित इन रुद्र पूजाओं को सुचारु रूप से संपन्न किया गया। इस अवसर पर सभी श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ रुद्र पूजा में भाग लिया तथा आध्यात्मिक वातावरण का भरपूर आनंद लिया।
इस महीने में हम ‘हर हर महादेव’ का जयघोष करते हैं और प्रार्थना करते हैं—
“हे शिव! हमारे जीवन से अज्ञान, दुख और विषाद को दूर करो। सभी का कल्याण हो, सुख-समृद्धि हो।”
संस्कृत में कहा गया है—
‘ज्ञानम् इच्छेत् महेश्वरात्, मोक्षम इच्छेत् जनार्दनात्।’
अर्थात् आत्मज्ञान के लिए शिव की शरण और मोक्ष के लिए विष्णु की उपासना की जाती है। पर वास्तव में शिव और विष्णु दोनों ही एक ही परम ब्रह्म के विभिन्न रूप हैं।

 

*प्रो. कान्ता कटारिया जेएनवीयू सिंडिकेट सदस्य मनोनीत* https://vandeexpressnews.com/प्रो-कान्ता-कटारिया-जेएन/

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